साहिल को नई नई जॉब लग गई। ऑफिस में उसकी दोस्ती नए लोगों से हुई। कुछ समय में ही साहिल अपने ऑफिस के दोस्तो से इतना अटैच हो गया कि वह उनके लिए कुछ भी कर सकता था। साहिल उन दोस्तों के लिए दिन रात सोचता रहता। उन्हें ऑफिस में काम से संबधित कोई समस्या न आए इसके लिए साहिल हमेशा चिंतित रहता था। साहिल अपने दोस्तों को हर दिन समझाता था कि यदि आप इस काम को ऐसे करोगे तो आपको यह फायदा मिलेगा।
साहिल अब उन दोस्तों के साथ व्हाट्सएप ग्रुप में भी जुड़ गया। सब उसमें दिन रात सभी बातें शेयर करते। खुशी की बात हो या कोई दुख की बात सब कुछ एक दूसरे से शेयर होता था। पर्सनल अटैचमेंट बाहर के साथ ऑफिस में भी दिखनी लगी। परंतु किस्मत का खेल समझो या मतलबी रिश्ता एक दिन असलियत सामने आ ही जाती है।
ज्यादा अटैचमेंट भी दुख का कारण बन जाता है और साहिल के साथ भी ऐसा ही हुआ। साहिल को ऐसा अहसास हुआ कि उसके दोस्त जिन्हें वह सबकुछ मानता था उसकी एक्सपेक्टेशन पर सही नही उतर रहे। उसके दोस्त अपनी पुरानी फितरत की तरह हमेशा उन लोगों को मनाने में लगे रहते जो उन्हें कभी भाव नही देते।
साहिल को जब यह पता चला तो उसने अपने दोस्तों को सचेत भी किया परंतु उसके दोस्त ये बात समझ ही नही रहे थे। समझे भी कैसे क्योंकि दोस्ती व् रिश्ता गहरा हो तो खामोशी भी सबकुछ बयान कर देती है।
अब साहिल अपने आपको बिलकुल अकेला महसूस कर रहा था। क्योंकि इससे पहले वह किसी से इतना अटैच नही हुआ था। कहते हैं जब दिल पर चोट लगती है तो जख्म और भी गहरा होता जाता है तो उसका दर्द बहुत सताता है। साहिल अब अपने आपको हर वक्त कोसता फिरता कि क्यों उसने इतनी अटैचमेंट कर ली। खाली दोस्ती होती तब उसको इतना फर्क नही पड़ना था।
साहिल किसी तरह इस नाम के रिश्ते को निभाता रहा और यह सोचता रहा कि कभी तो उसके दोस्त समझेंगे परंतु ऐसा कभी नहीं हुआ। एक दिन साहिल ने ठान लिया कि मतलबी और नाम के रिश्ते निभाने से अच्छा है वह उनसे दूर हो जाए। इसीलिए साहिल अब उन मतलबी और नाम के दोस्तो से दूरी बनाता गया। शुरुआत में साहिल को बहुत दुःख हुआ परंतु धीरे साहिल ने अपने दिल को समझा ही लिया। अब व्हाट्सएप ग्रुप तो था परंतु खाली मतलब की बात होती थी। दोस्त तो वहीं थे परंतु अब खाली काम की बात हुआ करती थी।
अब साहिल पहले के मुकाबले खुद को खुश रखने में लगा रहता। अब साहिल को किसी और की चिंता नहीं होती।
No comments:
Post a Comment